ज़िंदगी ऐसी बर्बादी क्यूँ है |
ज़िंदगी इतनी तन्हा क्यूँ है
जो भी मिला वो रुसवा क्यूँ है
जब साथ साथ चले थे
कितने सपने पले थे
सोचा था हर रंग होगा वहाँ
एक दूसरे का साथ होगा जहाँ
सब तरफ़ फ़ूल ही फ़ूल खिलाएंगे
बाग ही बाग ख़ुश्बू से भर जाएँगे
राह तो ऐसी ही चली थी
फिर क्यूँ काँटों की झड़ी थी
सबका भला किया जब
फिर क्यूँ ना फूल खिला तब
मेरी ज़िंदगी ऐसी क्यूँ है
ना सुलझे ऐसे पहेली क्यूँ है
बड़ी बेदर्द नासाज़ी क्यूँ है
ज़िंदगी ऐसी बर्बादी क्यूँ है
ज़िंदगी ऐसी अजीब क्यूँ है
ना सुलझे ऐसी जालसाज़ी क्यूँ है
वक़्त बे वक़्त मुश्किलें देती क्यूँ है
हर शक्स यहाँ तकलीफ़ में क्यूँ है
जब बिन बुलाए भेजा यहाँ
क्यूँ ना संग तू आया यहाँ
क्या सोचे बनाकर मुझे
उलझनों से घेरा तुझे
अब देख ऊपर से मुझे
पतझड़ में फेंका है तुझे
अब राह खुद की खुद बना
इस शहर ए जंगल से बाहर आ
इक बार तू जल कर तो देख
ख़ालिस स्वर्ण बन कर तो देख
ये ज़िंदगी की पहेली है
कभी हसीन कभी कँटीली है
क्या कहा-ज़िंदगी इतनी गमगीन क्यूँ है
आँख खोल कर देख पागल
ये सोच हर चीज़ यहाँ हसीन क्यूँ है
आँख जब तुने दी ही नहि
ज़िंदगी रंगीन लगेगी नहीं
रहम कर ए खुदा रहम कर
इस बंदे को अब रुकसत कर
ज़िंदगी ऐसी दर्दनाक क्यूँ है
मुझे मौत दे दे देरी क्यूँ है
ज़िंदगी ऐसी सुनसान क्यूँ है
हर शक्स यहाँ परेशाँ क्यूँ है
धूल धूसरित मिले सभी को
क्या कमी रह गयी बता मुझको
क्या फ़ूल ना चढ़ाए तेरी मज़ार पे
दीप दीये भी जलाये मंदिर की दीवार पे
कुछ तो बोल कुछ तो बता
या समझूँ मैं नहि है ख़ुदा
हर रोज़ यही अरदास करता हूँ
कभी तो मिले ये आस करता हूँ
आसमाँ से देख कर हँसने वाले
क्या तेरे यहाँ नहि इश्क़ करने वाले
जब इश्क़ मुकम्मल होना ही ना था
फिर पास क्यूँ हमें लाया
जब अलग थलग ही होना था
फिर क्यूँ दोनो का दिल धड़काया
ज़िंदगी की जद्दोजहद ऐसी क्यूँ है
हर किसी को यहाँ मशक़्क़त क्यूँ है
हर किसी को यहाँ शिकायत क्यूँ है
हर किसी को यहाँ शिकायत क्यूँ है
#zindagi #kahaniya #sad


Comments
Post a Comment